महाशिवरात्रि के पावन अवसर पर जब 12 ज्योतिर्लिंगों की चर्चा होती है, तब एक प्रश्न बार-बार सामने आता है — आखिर असली बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग कहां है?
क्या वह देवघर (झारखंड) में है?
या परली वैजनाथ (महाराष्ट्र) में?
या फिर बैजनाथ मंदिर (हिमाचल प्रदेश) में?
इस रहस्य के पीछे शास्त्र, परंपरा और जनआस्था तीनों ही गहराई से जुड़े हुए हैं। आइए, सच्चाई को समझते हैं — सुविचार और ज्योतिषीय दृष्टि से।
‘चिताभूमि’ का रहस्य — यहीं छुपा है असली संकेत
आदि शंकराचार्य ने अपने प्रसिद्ध स्तोत्र द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का उल्लेख करते हुए स्पष्ट लिखा है कि यह भारत की पूर्वोत्तर दिशा में स्थित ‘चिताभूमि’ में विराजमान है, जहां भगवान शिव माता गिरिजा के साथ निवास करते हैं।
यदि भारत के नक्शे को देखें, तो पूर्वोत्तर दिशा में स्थित प्रमुख स्थानों में झारखंड का देवघर ही इस संकेत पर सटीक बैठता है।

शिव पुराण की कथा क्या कहती है?
शिव पुराण के अनुसार, जब माता सती ने दक्ष यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनका शरीर लेकर व्याकुल होकर पृथ्वी पर घूमते रहे। उसी दौरान सती का हृदय जिस स्थान पर गिरा, वह स्थान ‘चिताभूमि’ कहलाया।
मान्यता है कि शिवजी ने वहीं हृदय का दाह-संस्कार किया और वही स्थान आगे चलकर शक्तिपीठ बना।
देवघर को इसी ‘हृदयस्थली’ शक्तिपीठ के रूप में माना जाता है — जहां आज भी बाबा वैद्यनाथ और माता का मंदिर साथ-साथ विराजमान हैं। यही संगति इसे विशेष बनाती है।
फिर हिमाचल और महाराष्ट्र का दावा क्यों?
1️⃣ हिमाचल का बैजनाथ मंदिर
कांगड़ा स्थित यह मंदिर प्राचीन और अत्यंत पूजनीय है। स्थानीय मान्यता में इसकी महिमा बहुत है, लेकिन इसे ‘चिताभूमि’ के रूप में शास्त्रों में स्पष्ट स्वीकृति नहीं मिलती।
2️⃣ महाराष्ट्र का परली वैजनाथ
परली का मंदिर भी प्रसिद्ध है और श्रद्धालुओं की बड़ी आस्था का केंद्र है। लेकिन ऐतिहासिक और शास्त्रीय प्रमाण इसे मूल बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं माने जाते।

आस्था भी देती है संकेत
देवघर में सावन मास के दौरान लाखों कांवड़िए सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर पैदल यात्रा करते हैं और बाबा पर जलाभिषेक करते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
आम जनमानस की निरंतर आस्था भी देवघर को ही असली बैद्यनाथ धाम मानती आई है।
ज्योतिषीय दृष्टि से क्या है संकेत?
‘वैद्यनाथ’ नाम स्वयं बताता है — रोग हरने वाले शिव।
देवघर का शक्तिपीठ स्वरूप, चिताभूमि का उल्लेख और पूर्वोत्तर दिशा का संकेत — ये सभी मिलकर इसे आध्यात्मिक ऊर्जा का अत्यंत शक्तिशाली केंद्र बनाते हैं।
पूर्वोत्तर दिशा वास्तु और ज्योतिष में ईशान कोण मानी जाती है — जो भगवान शिव और आध्यात्मिक जागरण की दिशा है। यह तथ्य भी देवघर की पहचान को और मजबूत करता है।
निष्कर्ष — शास्त्र और परंपरा किस ओर इशारा करते हैं?
जब हम
✔ आदि शंकराचार्य का उल्लेख
✔ शिव पुराण की कथा
✔ चिताभूमि और शक्तिपीठ का आधार
✔ सदियों पुरानी कांवड़ परंपरा
इन सभी पहलुओं को एक साथ रखते हैं, तो तस्वीर साफ नजर आती है —
👉 शास्त्रीय और पारंपरिक आधार पर झारखंड का देवघर ही असली बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
महाशिवरात्रि विशेष सुविचार
“जहां आस्था, शास्त्र और ऊर्जा का संगम हो — वही सच्चा धाम होता है।”

